पढ़े.. एक ऐसे ऋषि की कहानी जिसने कभी स्त्री को नहीं देखा, लेकिन जब देखा तो….

यदि हम भारत के इतिहास की बात करे तो भारत का इतिहास कई अजीबोगरीब कहानियो और घटनाओ से भरा हुआ है. जी हां इनमे से कुछ कहानिया तो ऐसी है, जिन्हे सुनने और जानने के बाद ये लगता है कि क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है. बरहलाल आज हम आपको इतिहास की एक ऐसी ही घटना से रूबरू करवाना चाहते है, जो आपको वास्तव में हैरान कर देगी और इसके बारे में जानने के बाद आप ये सोचने के लिए मजबूर हो जायेंगे, कि क्या वाकई में ऐसा हो सकता है. बता दे कि ये घटना एक ऐसे ऋषि की है, जिसने अपने जीवन में कभी किसी स्त्री को नहीं देखा था. मगर जब उन्होंने स्त्री को देखा तो वह अनुभव उनके लिए बेहद अजीब था.

गौरतलब है कि हम यहाँ ऋष्यश्रृंग की बात कर रहे है, जिन्होंने अपने जीवन में कभी लिंगभेद जैसी चीज को स्वीकार ही नहीं किया था. जी हां आपको जान कर हैरानी होगी कि वो कभी स्त्री और पुरुष में फर्क ही नहीं कर पाए थे. जिस तरह पुरुष उनके लिए उनके गुरु भाई थे, वैसे ही स्त्रियां भी उनके लिए उनकी गुरु भाई थी. बता दे कि ऋष्यश्रृंग विभाण्डक ऋषि के पुत्र और कश्यप ऋषि के पौत्र थे. वही अगर पुराणों की माने तो विभाण्डक ऋषि के कठोर तप से सभी देवता कांप उठे थे. ऐसे में उनका ध्यान भंग करने के लिए और उन्हें समाधि से हटाने के लिए स्वर्ग से उर्वशी को उन्हें मोहित करने के लिए भेजा गया था.

जी हां बता दे कि उर्वशी के आकर्षक रूप से विभाण्डक ऋषि का तप भंग हो गया था. इसके बाद दोनों के मिलाप से ही ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था. आपको जान कर हैरानी होगी कि पुत्र को जन्म देने के बाद उर्वशी का काम धरती पर खत्म हो गया था और फिर वह अपने पुत्र को ऋषि विभाण्डक के पास छोड़ कर दोबारा स्वर्ग में चली गई थी. ऐसे में उर्वशी के धोखा देने के बाद ऋषि विभाण्डक बहुत दुखी हुए थे और इस वजह से उन्होंने पूरी नारी जाति को दोषी ठहरना शुरू कर दिया था. बता दे कि ऋषि विभाण्डक अपने पुत्र को लेकर जंगल चले गए थे और तभी उन्होंने प्रण लिया कि वो अपने पुत्र पर कभी किसी स्त्री की छाया नहीं पड़ने देंगे.

गौरतलब है, कि जिस जंगल में वे तप करने गए थे वह जंगल अंगदेश की सीमा से लग कर था. ऐसे में ऋषि विभाण्डक के घोर तप करने के बाद अंगदेश में अकाल पड़ चुका था, जिससे सब लोग भूखे मरने लगे थे. इसके समाधान के लिए राजा रोमपाद ने अपने मंत्रियों और ऋषि मुनियो को बुलाया. ऐसे में सबका यही कहना था कि ये सब ऋषि विभाण्डक के क्रोध के कारण हो रहा है. इसलिए यदि उनके पुत्र ऋष्यश्रृंग को इस जंगल से बाहर निकाल कर नगर में ले जाया जाए तो ये अकाल खत्म हो जाएगा. बता दे कि ऋषि ऋष्यश्रृंग ने अपने जीवन में कभी किसी स्त्री को नहीं देखा था, इसलिए उन्हें आकर्षित कर पाना आसान नहीं था.

ऐसे में राजा ने अपने नगर की सभी देवदासियों को ऋष्यश्रृंग को आकर्षित कर उन्हें नगर की तरफ लाने का काम सौंपा. फिर एक दिन जब ऋष्यश्रृंग जंगल में विचरण करने के लिए निकले तो उन्होंने आश्रम में खूबसूरत देवदासियों को देखा. ऐसे में उन्हें अपना गुरुभाई मान कर ऋष्यश्रृंग भी उनके पास चले गए. बता दे कि अगले दिन ऋष्यश्रृंग उन देवदासियों को ढूंढते ढूंढते उनके आश्रम तक जा पहुंचे. ऐसे में देवदासियों को उनका काम पूरा होते हुए दिखा. उन्होंने ऋषि से कहा कि वह उनके साथ नगर की तरफ चले. ऐसे में ऋषि ने उनकी बात मान ली और वे नगर की तरफ चल दिए. फिर जब ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद के दरबार पहुंचे तो उन्होंने ऋषि जी को पूरी घटना बताई कि वास्तव में ऋषि विभाण्डक के तप को तोड़ने के लिए उन्होंने ऐसा किया.

बता दे कि इससे ऋषि विभाण्डक गुस्से से भड़क उठे और रोमपाद के दरबार में पहुँच गए. ऐसे में ऋषि विभाण्डक का गुस्सा शांत करने के लिए रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह विभाण्डक के पुत्र ऋष्यश्रृंग से कर दिया. आपको जान कर हैरानी होगी कि इस घटना से कई साल पहले ही संतकुमार ने राजा पूर्वाकल से कहा था कि महर्षि विभाण्डक को एक महान पुत्र की प्राप्ति होगी और उनके द्वारा किये गए पुत्रप्राप्ति के यज्ञ से ही राजा दशरथ के घर भगवान् राम का जन्म होगा. इसके साथ ही सबसे हैरान कर देने वाली बात तो ये है कि राजा रोमपाद ने ऋष्यश्रृंग से अपनी जिस दत्तकपुत्री का विवाह किया था वो वास्तव में राजा दशरथ की पुत्री और भगवान् राम की बहन थी.

बरहलाल इतिहास की ये कहानी कितनी सही है और कितनी गलत ये तो हम नहीं कह सकते, लेकिन इतना जरूर तय है कि इतिहास कभी गलत नहीं होता.