देखें, हवा में झूलता है इस मंदिर का खंभा, आश्चर्य कि कैसे टिका हुआ है इस पर मंदिर..

दक्षिण भारत में अनेक प्रसिद्ध मंदिर है। बहुत से मंदिर प्राचीन और अपने वैभवशाली इतिहास के लिए जाने जाते है। इन्ही प्रमुख मंदिरों में से एक लेपाक्षी मंदिर। ये अपने इतिहास के लिए ही नही बल्कि अपने चमत्कार की वजह से भी जाना जाता है। भारत के आन्ध्र प्रदेश राज्य के अन्तर्गत के अनंतपुर जिले का एक गाँव है। यह स्थान सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आस्था और विश्वास पर टिका आंध्र प्रदेश के अनंतपुर का एक मंदिर आज भी धर्म और विज्ञान के लिये अबूझ पहेली बना हुआ है।

कैसे पड़ा ‘लेपाक्षी’ नाम

इसके पीछे कहानी ऐसी है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे। जब माता का अपहरण कर रावण ले जा रहा था तभी पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध किया और घायल हो कर इसी स्थान पर गिरे थे। माता की तलाश में श्री राम यहां पहुंचे तो उन्होंने ‘ले पाक्षी’ कहते हुए जटायु को अपने गले लगा लिया। ले पाक्षी एक तेलुगु शब्द है जिसका मतलब है ‘उठो पक्षी’।

मंदिर से जुड़ी अन्य मान्यता

जिस पर्वत पर ये मंदिर बना उसका रामायण में जिक्र है जटायु ने इसी पहाड़ पर रावण को रोका था और युद्ध किया था। यहा जटायु घायल हो गया था, ये वही स्थान है, जहां जटायु ने राम को रावण का पता बताया था। यहां एक पैर का निशान भी है, कोई इसे राम का पैर तो कोई सीता के पैर का निशान मानते हैं।

शिव के अनेक रूप

मंदिर 16 वीं सदी में बनाया गया और एक पत्थर की संरचना है। मंदिर विजयनगरी शैली में बनाया गया है।मंदिर को विजयनगर के राजाओं ने बनवाया था। इस मंदिर में इष्टदेव श्री वीरभद्र है। वीरभद्र, दक्ष यज्ञ के बाद अस्तित्व में आए भगवान शिव का एक क्रूर रूप है।

 

जमीन को नहीं छूता है लेपाक्षी मंदिर का पिलर

यह मंदिर कलाकृति का एक जीवंत नमूना है।लेपाक्षी मंदिर 70 पिलर (खंभा) पर खड़ा एक निहायत कलात्मक और खूबसूरत मंदिर है। इसके 70 वजनदार खंभों में एक खंभा ऐसा भी है, जो जमीन को नहीं छूता है, बल्कि हवा में लटका हुआ है। इस एक झूलते हुए पिलर के कारण यह मंदिर ‘हैंगिंग टेम्पल’ कहलाता है। ब्रिटिश शासनकाल में कई अंग्रेज़ आर्किटेक्ट ने इस पिलर के हवा में झूलने का रहस्य जानने की कोशिश की, लेकिन वे कभी सफल नहीं हो पाए। आज भी यह एक रहस्य ही है।

नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा

इस मंदिर से थोडा दूर एक ही पत्थर से बनी विशाल नंदी प्रतिमा है जो 27फीट लम्बी एयर 15 फीट ऊँची है यह विश्व की एक ही पत्थर से बनी दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा है।

पैरों के निशान

जिस पर्वत पर ये मंदिर बना है, उस जगह का पहला ज़िक्र मिलता है रामायण में। कहते हैं जब रावण सीता का अपहरण करने के बाद श्रीलंका रवाना हुआ तो पक्षीराज जटायु ने इसी जगह पर रावण का रास्ता रोका था। ऐसा माना जाता है कि ये वही जगह है, जहां रावण और जटायु के बीच भयंकर युद्ध हुआ और इसी जगह पर रावण ने जटायु को घायल कर दिया था। ये सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि इस मंदिर में मौजूद एक निशान को उस कहानी का गवाह बताया जाता है।

पैरों के इस निशान को लेकर कई मान्यताएं हैं। कोई कहता है ये देवी दुर्गा का पैर है, कोई इसे श्रीराम के निशान मानता है। लेकिन इस मंदिर का इतिहास जानने वाले इसे सीता का पैर मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि जटायु के घायल होने के बाद सीता ने जमीन पर आकर खुद अपने पैरों का ये निशान छोड़ा था और जटायु को भरोसा दिलाया था, कि जब तक भगवान राम यहां नहीं आते, यहां मौजूद पानी जटायु को जिंदगी देता रहेगा। ऐसा माना जाता है कि ये वही स्थान है, जहां जटायु ने श्रीराम को रावण का पता बताया था।