पुनर्जन्म: भूटान के 3 साल के राजकुमार ने खुद को बताया 1300 साल पुराने नालंदा विश्वविधालय का छात्र, उड़ जाएंगे आपके होश

पुनर्जन्म के बारे में तो आपने भी जरूर सुना होगा। इससे जुड़ी कई कहानियां और किस्से भी आपने सुने होंगे। पुनर्जन्म एक विषय है जिस पर अभी तक पूरी दुनिया की एक राय नहीं बन पाई है। किसी को इसपर विश्वास है तो कईयों को ये सिर्फ कहानी लगती है। ऐसे में कई बार हमारे सामने पुनर्जन्म से जुड़ी ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जिसपर ना चाहते हुए भी हमें विश्वास करना पड़ता है। जी हां कई ऐसी घटनाएं होती हैं जो पुनर्जन्म पर विश्वास करने को मजबूर कर देती है। एक ऐसा ही वाक्या सामने आया है जहां भूटान के शाही परिवार का तीन साल का राजकुमार अपने 1300 साल पुराने पुनर्जन्म की बातें बता रहा है।

अभी हाल ही में भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक चार दिवसीय दौरे पर भारत आए थे। यहां उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान राजा खेसर की पत्नी महारानी जेटसन पेमा वांगचुक और प्रिंस जिग्मे नामग्याल वांगचुक भी उनके साथ मौजूद थे। प्रिंस जिग्मे नामग्याल के साथ पीएम की तस्वीरें भी वायरल हुई। पीएम नन्हें राजकुमार के साथ खेलते हुए भी दिखे और उन्होंने प्रिंस से हाथ भी मिलाया।

दरअसल भूटान का राज परिवार उस वक्त हैरान रह गया, जब प्रिंस जिग्मे नामग्याल वांगचुक ने ये दावा किया कि वो पिछले जन्म में प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर चुके हैं। उनके परिवार वालों की मानें तो जिग्मे वांगचुक एक साल की उम्र से ही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के नाम का उच्चारण कर रहे हैं। पहले तो यह किसी को समझ में नहीं आया,  लेकिन जब वो बड़े हुए तो उन्होंने बताया कि पिछले जन्म में उन्होंने यहां पढ़ाई की है, यह सुनना सभी के लिए काफी आश्चर्यजनक अनुभव था।

इन दावों और बातों को जांचने-परखने के लिए पिछले साल उनका परिवार भारत भी आया था। वो अपनी मां और दादी यानी राजमाता दोजी आंग्मो के साथ यहां आए थे। बताया जा रहा है कि जब महज तीन साल की उम्र में प्रिंस नालंदा विश्वविधायल में पहुंचे तो वहां प्रिंस ने अजीबोगरीब एक्टिविटीज शुरु कर दी। वो खुद-ब-खुद वहां की जगहों के बारे में बताने लगे। उस जिस कमरे में पढ़ाई किया करते थे, वहां के खंडहर को भी उन्होंने काफी दौड़- दौड़कर ढूंड निकाला। उन्होंने अपने सोने वाला कमरा भी दिखाया।

महारानी की माने तो उन्होंने कहा कि प्रिंस भूटान में नालंदा विवि के बारे में जैसा बताया करते थे, यहां वैसा ही देखने को मिला। प्रिंस जिग्मी आठवीं सदी पूर्व में जन्मे थे। उस दौर में उनका नाम विरोचना था और उन्होंने नालंदा विश्वविद्याल से पढ़ाई की थी। राजमाता ने बताया था कि जिग्मी ने उन लोगों से नालंदा के स्तूप से लेकर हर चीज का जो आकार और संरचना बताई थी, वो यहां आने के बाद वैसे ही निकली।इतना ही नहीं प्रिंस जिग्मे नामग्याल वांगचुक ने खंडहर में मौजूद विभिन्न अवशेषों और संरचनाओं के बारे में कई चौंकाने वाली जानकारियां दी। उन्‍होंने कहा था कि भगवान बुद्ध की कृपा से उनका पुनर्जन्म राज घराने में हुआ है।

आपको बता दें कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त काल के दौरान 5वीं सदी (413 ईस्वीं) में हुई थी। 1193 में आक्रमण के बाद इसे नेस्तनाबूद कर दिया गया था। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमार गुप्त प्रथम 450-470 को मिला है। यह विश्व का प् पहला आवासीय विश्वविद्यालय था। उस समय इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब 10,000 और अध्यापकों की संख्या 1500 थी।