यहां दहेज में पैसे नहीं बल्कि दिए जाते हैं सांप, इसके बिना नहीं होती है शादी

सांप जहां ये नाम सुनकर लग कांप जाते हैं, वहीं आपको तो ये भी मालूम ही होगा कि हमारे देश भारत में सांपों को पूजा भी जाता है। जी हां हमारे देश में सांप को ‘देवता’ की संज्ञा दी गई है। भारत में बहुत सी ऐसी परंपराएं हैं जहां सांप विशेष भूमिका निभाते हैं और सांपों की अनुपस्थिति में सदियों से चली आ रही ये परंपराएं अधूरी मानी जाती है। ऐसी ही एक प्रचलित परंपरा है छत्तीसगढ़ में ।  जहां सांपों के बिना शादी नहीं होती है। आज हम आपके एक ऐसे गांव के बारे में बता रहे हैं जहां पर लड़कियों को शादी के बाद दहेज में 21 सांप दिए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में जोगीनगर एक ऐसी जगह है जहां पर ऐसी पंरपरा है कि हर घर में जहरीले सांपो को अपने बेटों की तरह पाला जाता हैं और वहीं पाले हुए सांप की मौत हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार भी इसांन की तरह ही किया जाता है। इसके अलावा जिस घर में सांप की मौत होती है वहां परिवार का मुखिया अपनी दाढी मूंछ कटवाता है और पूरें गांव में प्रतिभोज करता है।

छत्तीसगढ़ एक आदिवासी अंचल है आज भी आपको रीति- रिवाज और पुरानी परंपरा देखने को मिल जाएगी । वहीं इस समुदाय में एक अनोखी परंपरा है जहां बेटी की शादी में सांपों का जोड़ा दिया जाता है। इसके बिना शादी संपन्न नहीं होती है। इसे ये लोग शुभ मानते हैं। शादी  के दौरान वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष को दहेज के रुप में करीब 21 सांपों का उपहार दिया जाता है जो कि एक अनिवार्य परंपरा है। जिसके बिना यहां पर विवाह नहीं होता है। परिवार की हैसियत भी समाज में घर में पल रहे सांपों की संख्या से तय होती है। जिसके यहां ज्यादा सांप वही समृद्ध और इज्जतदार कहलाता है। कई बार शादी की तारीख तक सांपों का इंतजाम नहीं हो पाता है। ऐसे में शादी की तारीख आगे बढ़ा दी जाती है। – इस कम्यूनिटी के लोगों का कहना है कि सांप धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। ऐसे में बेटी की शादी के लिए 21 सांपों का इंतजाम करना बहुत मुश्किल होता है।  हर जगह आबादी बढ़ने से सांपों की संख्या कम होती जा रही है। सांप मिलने मुश्किल हो रहे हैं। ऐसे में जवान बेटियों का ब्याह करना मुश्किल हो रहा है।  सांप पालने के सरकारी प्रतिबंध से जहां सपेरों को रोजी-रोटी का संकट है, वहीं बेटियों के कुंआरी रह जाने का डर भी सता रहा है।

यहां रहने वाले विभिन्न आदिवासी समूहों में से एक है सपेरों का समुदाय। वैसे तो अब यह लोग मजदूरी और अन्य रोज़गार के संसाधनों से अपना पेट पालते हैं लेकिन नाग पंचमी पर यह लोग सपेरों की दुनिया के नियमों का पालन करते हैं। वे सांपों को पकड़ते हैं, उनकी पूजा करते हैं और नाग पंचमी के बाद उन्हें दोबारा आज़ाद कर देते हैं।

समुदाय के लोग सांपों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं और पूरा परिवार साथ बैठकर सांपों के साथ खाना खाता है। समुदाय के बच्चे खिलौनों से नहीं बल्कि सांपों के बच्चों के साथ खेलते हैं। समुदाय के लोगों का अटूट विश्वास है कि उन पर गुरु गोरखनाथ जी का आशीर्वाद है जिस कारण सांप उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। विशेषकर सावन माह में इन्हें सांप नहीं काटते हैं और अगर कोई सांप काट ले तो इस समुदाय के लोगों पर जहर का असर नहीं होता है।